इस श्लोक में हनुमान जी को सुवर्चला नाम की शक्ति (देवी) के साथ, चार भुजाओं वाले दिव्य रूप में, और ऊँट (उष्ट्र) पर आरूढ़ वीर स्वरूप में नमस्कार किया गया है। इसमें बताया गया है कि हनुमान जी अनेक रूपों में भक्तों की रक्षा करते हैं—कभी शांत, कभी विशाल, तो कभी तेजस्वी योद्धा के रूप में। ऐसे पराक्रमी, शक्तिशाली और सदैव रक्षक हनुमान जी पर मंगल की कामना की गई है।
दिव्यमङ्गलदेहाय पीताम्बरधराय च।
तप्तकाञ्चनवर्णाय मंगलं श्रीहनुमते
इस श्लोक में हनुमान जी के दिव्य और शुभ शरीर की स्तुति की गई है। उन्हें पीले वस्त्र (पीताम्बर) धारण करने वाले तथा तपे हुए सोने के समान उज्ज्वल, गेहुँआ और चमकदार वर्ण वाले रूप में नमस्कार किया गया है। यह श्लोक बताता है कि हनुमान जी का स्वरूप स्वयं में ही शुभ, तेजोमय और कल्याणकारी है। ऐसे प्रभामय, दिव्य तेज से युक्त श्री हनुमान जी पर मंगल की कामना की गई है।
भक्तरक्षाशीलाय जानकीशोकहारिणे।
ज्वलत्पावकनेत्राय मङ्गलं श्रीहनुमते
इस श्लोक में हनुमान जी को भक्तों की रक्षा करने वाले, माता जानकी के शोक को दूर करने वाले तथा अग्नि के समान तेजस्वी और ज्वलंत नेत्रों वाले रूप में नमस्कार किया गया है। यह बताता है कि हनुमान जी अपने भक्तों के दुख हरने वाले और अत्यंत वीर, तेज से भरे हुए देव हैं। ऐसे दयालु और शक्तिशाली हनुमान जी पर मंगल की कामना की गई है।
पंपतीर्विहाराय सौमित्रिप्राणदायिने।
सृष्टिकरणभूताय मंगलं श्रीहनुमते
इस श्लोक में हनुमान जी को पंपा सरोवर के आसपास विहार करने वाले, लक्ष्मण (सौमित्रि) को जीवन देने वाले तथा ब्रह्माण्ड की सृष्टि में सहायक दिव्य शक्ति के रूप में नमस्कार किया गया है। यह बताता है कि हनुमान जी केवल वीर ही नहीं, बल्कि जीवनदाता, पालनकर्ता और सृष्टि-संचालन में सहायक तेजस्वी शक्ति भी हैं। ऐसे कल्याणकारी और सर्वशक्तिमान हनुमान जी पर मंगल की कामना की गई है।
सर्वलोकनाथाय मंगलं श्रीहनुमते
कौण्डिन्यगोत्रजाताय मंगलं श्रीहनुमते