Shri Hanuman Bhujanga Prayata Stotra | श्री हनुमान भुजंग प्रयात स्तोत्र — अर्थ एवं भावार्थ सहित
| श्रीहनुमत्-भुजङ्ग-प्रयात-स्तोत्रम् | Hanumath Bhujanga Prayata Stotram | सरल भावार्थ |
| प्रपन्नानुरागं प्रभाकाञ्चनाभं जगत्गीतसौर्यं तुषाराद्रिदैर्यम् । तृणीकृत्य हेतिं रणोद्यद्विभूतिं भजे वायुपुत्रं पवित्रात्पवित्रम् ॥ १ ॥ |
Prapannanuragam, prabha kanchanabham, Jagat geetha souryam, thusharadri dairyam, Thruneekruthya hethim ranodhyad vibhoothim, Bhaje vayu puthram, pavithrath pavithram. // 1 // |
मैं वायु-पुत्र हनुमान की स्तुति करता हूँ, जो सुनहरे तेज से चमकते हैं, जो संसार भर में पराक्रम के लिए प्रसिद्ध हैं, जो पर्वत समान धीरज वाले हैं। रणभूमि में जिनकी शक्ति सबका नाश कर देती है — वे अत्यंत पवित्रों में भी सबसे पवित्र हैं। |
| भजे हेमरम्भाभवाननित्यवासं भजे बालभानुप्रभाचारुभासम् । भजे चन्द्रिकाकुण्डमन्दरहासं भजे सन्ततं रामभूपालदासम् ॥ २ ॥ |
Bhaje hemarambhavanenithyavasam, Bhaje bala bhanu prabhacharu bhasam, Bhaje chandrika kunda mandarahasam, Bhaja santhatham ramabhoopaladasam. // 2 // |
मैं उस हनुमान का स्मरण करता हूँ जो माता अंजना की गोद में सदैव निवास करते हैं, जिनका तेज उगते हुए सूर्य के समान है, जिनकी मुस्कान चन्द्रमा और कुन्द पुष्प की तरह शीतल है, और जो सदैव भगवान श्रीराम के चरणों के सेवक हैं। |
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भजे लक्ष्मणप्राणरक्षा-सुदक्षं
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Bhaje lakshmana prana raksha sudaksham, Bhaje thoshitha sesha geervana paksham, Bhaje gora sangrama seemahathaksham, Bhaje rama namanu sampraptha laksham. // 3 // |
जो लक्ष्मणजी की प्राण-रक्षा में सदैव तत्पर रहे, जो देवताओं तथा ऋषियों द्वारा प्रशंसित हैं, जो भीषण युद्धों में अजेय हैं, और जिन्हें श्रीराम-नाम जपते हुए अपार सिद्धियाँ प्राप्त हुईं — उन हनुमान की मैं वंदना करता हूँ। |
| कृतभीति-नादं क्षितिक्षिप्तपादं घनाक्रान्तजङ्घं कटिस्थोदराङ्गम् । अजान्तस्थकेशं भुजालिष्टदशं जयश्रीसमेतं भजे रामदूतम् ॥ ४ ॥ |
Krutha bheethi nadam kshithi kshiptha padam, Ghanakrantha jangam kati sthodu jangam, Ajandastha kesam bhjaslishta dasam, Jaya sree sametham, bhaje ramadhootham. // 4 // |
जो युद्ध में गर्जना कर शत्रुओं में भय उत्पन्न करते हैं, जिनके पैरों का प्रहार पृथ्वी को हिला देता है, जिनकी भुजाएँ बहादुर योद्धाओं को बाँध लेती हैं — ऐसे विजयी एवं श्रीयुक्त श्रीरामदूत का मैं स्मरण करता हूँ। |
| चलत्बालगत्या ब्रह्मचक्रावलं कदारूत-हासात् प्रभिन्नाजबिन्दुम् । महासिंहनादद्विषीर्णत्रिलोकम् भजे चाञ्जनेयं प्रभुं वज्रकायम् ॥ ५ ॥ |
Chalath bala gathad brama chakravalam, Kadorattahasath prabhinnaja bhandam, Maha simha nada dwiseerna trilokam, Bhaje chanjaneyam prabhum vajra kayam. // 5 // |
जिनके चलने से ब्रह्माण्ड कांप जाता है, जिनकी हँसी से असुरों के समूह टूट जाते हैं, और जिनके सिंहनाद से तीनों लोक भयभीत हो जाते हैं — उस वज्र-शरीर वाले पवनपुत्र को मैं प्रणाम करता हूँ। |
| रणे भीषणें मेघ-नादादिनादे सरोषं समावाप्य सौमित्रमंशे । खगेषां घनेषां सुराणां च मार्गे नटन्तं नमन्तं हनूमन्तमेढे ॥ ६ ॥ |
Rane bheeshane megha nadadhi nadhe, Sarosham samavapya soumithramamse, Khaganaam ghanaanam suranam cha marge, Natantham namantham hanumanthamede. // 6 // |
जो युद्ध में गरजते हुए मेघ के समान प्रचंड हैं, जो क्रोध में सौमित्र (लक्ष्मण) को अपनी बाँहों में उठा लेते हैं, और जो पक्षियों, देवताओं तथा समस्त जीवों के मार्गों में नर्तन करते हुए दिखाई देते हैं — उन हनुमान को मैं वंदन करता हूँ। |
| नखस्पष्ट-जम्भारि-दम्बोलिधरं करद्वन्द्वनिर्धूह-कारोग्रदण्डम् । पदाघातभीतेहि राजाधिवासं रणक्षोभदक्षं भजे पिङ्गलाक्षम् ॥ ७ ॥ |
Nakha pastha jambhari dambolidharam, Karadwandwa nirdhooha karogra dandam, Pada gatha bheethahi rajadhi vasam, Rana kshobha daksham bhaje pingalaksham. // 7 // |
जिनके नखों की चमक से असुर काँप उठते हैं, जिनकी भुजाएँ दुष्टों को नष्ट कर देती हैं, जिनके पाँवों का स्पर्श राजाओं को भयमुक्त कर देता है — ऐसे पिंगल नेत्रधारी हनुमान की मैं स्तुति करता हूँ। |
| प्रदोṣe प्रभाते तथा चार्धरात्रे शुभाङ्गं जिताङ्गं लीलाप्रसङ्गम् । सदा भावयन्मनसा तं वदेद्यः स धन्यः समन्यो न चास्योपदस्ते ॥ ८ ॥ |
Pradoshe prabhathe thada cha ardha rathre, Shubangam jitha nanga leela prasangam, Sada bhavayan manaseamum vadhedhya, Ssa dhanyassa maanyo na chaasyopadasthe. // 8 // |
जो मनुष्य प्रभात, संध्या और आधी रात—इन तीनों समय में हनुमान का स्मरण करता है, वह शुद्ध, तेजस्वी और पवित्र बन जाता है। ऐसा भक्त सौभाग्यशाली होता है और संकट उसके निकट नहीं आता। |
| विलद्वारि भूपालकद्वारिघोरे गजव्याघ्रसिंह- कुलारण्यभागे । शरण्याय वर्ण्याय देवैरनस्ते नमस्ते कपिश्रेष्ठ रामप्रियाय ॥ ९ ॥ |
Viladwari bhoopalakadwari ghore, Gaja vyagra simha kularanya bhage, Saranyaya varnyaya devair namasthe, Namasthe kapi sreshta rama priyaya. // 9 // |
जो घोर वन में, पशुओं और सिंहों से घिरे क्षेत्र में भी रक्षक हैं, और देवताओं द्वारा पूज्य हैं — ऐसे श्रीरामप्रिय हनुमान, आपको बारम्बार नमस्कार। |
| सुधासिन्धुमुल्लङ्घ्य साधोनिषेधे सुदंष्टा प्रगुप्तां सुदामौषधिस्थाम् । क्षणादेव द्रोणाचलेनानेतुकामं भवन्तं विना को हि लोके समर्थः ॥ १० ॥ |
Sudha sindhumuulangya sadhoni ssedhe, Sudhandhapraknupthasudhamoushadhhestha, Kshanadrona shaileyasarena nethum, Bhavantham vina ko hi loke samartha. // 10 // |
जिसने क्षणमात्र में समुद्र पार कर अमृत-सागर तक पहुँचकर संजीवनी बूटी ला दी — ऐसा महान कार्य बिना आपके संसार में और कौन कर सकता है? हनुमान ही सर्वशक्तिमान हैं। |
| समुद्रं तरङ्गादिरौद्रं विनिद्रं विलंघ्योरुजङ्घं स्तुतमार्त्यसङ्घम् । निरातङ्कलङ्कां विलङ्कां विधाय पितेवासी सीतां दितापापहारी ॥ ११ ॥ |
Samudhram tharangadhi roudhram vinidhram, Vilamghoru jhanga sthutha marthya sangha, Nirathanga lankam vilankam vidhaya, Pithevasi seethathitha papa hari. // 11 // |
समुद्र की उग्र लहरों को पार कर, लंका में प्रवेश कर, सारी लंका को भयमुक्त कर देने वाले, और सीताजी के पिता समान दुःख दूर करने वाले हनुमान — मैं आपकी वंदना करता हूँ। |
| रमानाथ रामं क्षमानाथ रामं यशःहेतुभूतं वियोगं विधाय । वनं सन्तहानं जवाद्धानवानं सदा चिन्तये श्रीहनूमन्तमेव ॥ १२ ॥ |
Remanadha Ramaam kshamanadha ramaam, Yaso hethu bhootham visokam vidhaya, Vanam santhahantham javaddhana vaanam, Sada chinthaye sree hanumanthameva. // 12 // |
जो श्रीराम के दुख दूर करते हैं, जिनके कारण राम-नाम की महिमा फैली, जिन्होंने लंका से सीताजी का पता लगाया — ऐसे श्रीहनुमान ही मेरे मन में सदा रहें। |
| जराभारतो भूरिपीडासरीरः कृरोडारणा रोढभूरिप्रतापः । भवद्भक्तिभावं भवद्भक्तिरक्तिं कुरु श्रीहनूमन् प्रभो मे दयालो ॥ १३ ॥ |
Jarabharatho bhooripeeda sareere, Irooda ranaa rooda bhooriprathapa, Bhavath pada bhakthim bhavad bhakthi rakthim, Kuru sri hanumath prabho, may dayalo. // 13 // |
हे श्रीहनुमान! मैं शरीर और मन की पीड़ाओं से व्याकुल हूँ, मेरी उम्र बढ़ रही है, मेरे भीतर शक्ति घट रही है — मुझे अपने भक्तिभाव में रंग दीजिए और कृपा कीजिए। |
| उदारान्तरङ्गं सदारामभक्तं समुद्धण्डवृत्तिं द्विषद्धण्डलोलम् । अमोघानुभावं तमोघagna-दक्षं तदात्मप्रभावं हनूमन्तमेढे ॥ १४ ॥ |
Udharantharangam sada rama bhaktham, Samuddhanda vruthim dwishaddhanda lolam, Amoghanubhavam thamougagna daksham, Thanmath prabhavam Hanumantha meede. // 14 // |
जो अंदर से अत्यंत पवित्र हैं, जो सदैव रामभक्त हैं, जिनका बल असुरों को डराने वाला है, जो अंधकार (अज्ञान) को मिटाने में सक्षम हैं — उन महाशक्ति स्वरूप हनुमान की मैं स्तुति करता हूँ। |
| करोत्फुल्लतङ्गं किरीटध्वजङ्गं हताशेषपक्षं रणेनिर्विषङ्गम् । ज्वलत्कुण्डलाङ्गं त्रिलोकैर्मृगाङ्गं रणद्धस्तलङ्कां भजे निष्कलङ्कम् ॥ १५ ॥ |
Karothbhasi tangam kireetidhwajangam, Hathaseshapangam rane nirvisangam, Jwalath kundalangam trilokee mrukangam, Ranath basma lankaam, Bhaje nishkalankam. // 15 // |
जो युद्ध में चमकती तलवार जैसे तेजस्वी हैं, जिनके मुकुट और ध्वज शत्रुओं का नाश करते हैं, जिनका तेज तीनों लोकों में प्रसिद्ध है — उन निष्कलंक हनुमान को मैं प्रणाम करता हूँ। |
| महाभूतपीडां महोद्धूतपीडां महाव्याधिपीडां महादीप्तपीडाम् । हरस्वश्रुताभीष्टदानप्रदायिन् नमस्ते नमस्ते कपेन्द्रप्रसिद्धे ॥ १६ ॥ |
Maha bhootha peedam mahothpada peedam, Maha vyadhi peedam, mahadhipra peedam, Hara swasritha bheeshta dana pradhayin, Namasthe namasthe kapeendra prasathe. // 16 // |
जो दैहिक, दैविक और भौतिक — इन तीनों प्रकार के दुखों को दूर करते हैं, जो भक्तों की हर इच्छा तुरंत पूरी करते हैं — हे कपीन्द्र! आपको बारंबार नमस्कार। |
| नमस्ते महाशौर्यवाहाय तुभ्यं नमस्ते महावज्ररेखाय तुभ्यम् । नमस्ते महाकालकालाय तुभ्यं नमस्ते महादीर्घवलाय तुभ्यम् ॥ १७ ॥ |
Namasthe maha sathwa vahaya thubhyam, Namasthe maha vajra rekhaya thubhyam, Namasthe maha kalakalaaya thubhyam, Namasthe maha deerga valaya thubhyam. // 17 // |
हे महा-शूरवीर! आपको प्रणाम। हे वज्र-समान शरीर वाले! आपको प्रणाम। हे काल के काल! आपको प्रणाम। हे दीर्घभुजाधारी! आपको प्रणाम। |
| नमस्ते महासौरितुल्याय तुभ्यं नमस्ते फलाभूतरूढाय तुभ्यम् । नमस्ते महामर्त्यकायाय तुभ्यं नमस्ते महद्ब्रह्मचर्याय तुभ्यम् ॥ १८ ॥ |
Namasthe mahasouri thulyaya thubhyam, Namasthe phalee bhootha sooryaya thubhyam, Namasthe maha marthya kayaya thubhyam, Namasthe mahath brahma charyaya thubhyam. // 18 // |
हे सूर्य-सम तेजस्वी, फलदायी, अतुलनीय शरीर वाले, महाब्रह्मचारी हनुमान — आपको बारम्बार नमस्कार। |
| हनुमत्भुजङ्गं प्रभातप्रयाते प्रयाणे प्रदोषे पठेद् वै शतोपि । विमुक्ताऽघसङ्घः सदा रामभक्तः कृतार्थो भविष्यत्युपेतप्रमोदः ॥ १९ ॥ |
Hanumath bhujangam prabhatha prayathe, Prayane pradhoshe padan vai satopi, Vimukthwagha sangha sada rama bhaktha, Kruthartho bhavishyathyupatha pramodha. // 19 // |
जो इस स्तोत्र का पाठ सुबह, यात्रा के समय, या संध्या में करता है — वह पापों से मुक्त हो जाता है, सदैव श्रीराम का भक्त बनता है, और जीवन में परम आनंद प्राप्त करता है। |
