भारतीय वास्तु परंपरा में वास्तु पुरुष का नाम बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। आज जब भी घर, मंदिर या किसी भवन के निर्माण से पहले वास्तु पूजा की बात होती है, तब वास्तु पुरुष का उल्लेख जरूर आता है। लेकिन एक सवाल स्वाभाविक है आखिर वास्तु पुरुष कौन हैं और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?
इस विषय पर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। हालांकि, यदि हम किसी मूल शास्त्रीय स्रोत के आधार पर इस कथा को समझना चाहें, तो मत्स्य पुराण के अध्याय 252 में इसका एक स्पष्ट वर्णन मिलता है। इस अध्याय का विषय ही प्रासाद, भवन और वास्तु से जुड़ा है। कथा के अनुसार, वास्तु पुरुष की उत्पत्ति भगवान शिव के ललाट से गिरे स्वेद से हुई थी। इसके बाद उनका विशाल रूप इतना शक्तिशाली हो गया कि देवताओं को उन्हें भूमि पर रोकना पड़ा।
आइए इस पूरी कथा को सरल भाषा में समझते हैं।
वास्तु पुरुष की कथा कहां मिलती है?
मत्स्य पुराण के अध्याय 252 की शुरुआत ऋषियों के उस प्रश्न से होती है जिसमें वे भवन और प्रासाद के निर्माण की विधि तथा वास्तु के स्वरूप के बारे में पूछते हैं। इसके उत्तर में सूत वास्तुशास्त्र की परंपरा बताते हुए वास्तु पुरुष की उत्पत्ति की कथा सुनाते हैं। इसी अध्याय में वास्तुशास्त्र के 18 उपदेशकों का भी उल्लेख मिलता है।
इसलिए वास्तु पुरुष की उत्पत्ति की कथा लिखते समय मत्स्य पुराण अध्याय 252 को मुख्य आधार बनाना सबसे उचित है।
शिव के ललाट से हुई एक अद्भुत उत्पत्ति
कथा उस समय की है जब भगवान शिव का अंधकासुर के साथ भयंकर युद्ध चल रहा था।
युद्ध के दौरान भगवान शिव के ललाट से पसीने की एक बूंद पृथ्वी पर गिरी। मत्स्य पुराण में बताया गया है कि उस स्वेद-बूंद से एक अत्यंत भयंकर और विशाल प्राणी उत्पन्न हुआ। उसका मुख विकराल था और उसका स्वरूप इतना विशाल था कि वह मानो पूरे आकाश और पृथ्वी को अपने भीतर समेट लेने वाला हो।
यही प्राणी आगे चलकर वास्तु पुरुष कहलाया।
यहां यह समझना जरूरी है कि कथा में उसका नाम जन्म लेते ही “वास्तु पुरुष” नहीं बताया गया है। शुरुआत में उसे एक भयंकर प्राणी के रूप में वर्णित किया गया है। उसका नाम और वास्तु से संबंध कथा के आगे के प्रसंग में स्पष्ट होता है।
अंधकासुर का रक्त पीने के बाद भी नहीं मिटी भूख
उस समय युद्धभूमि में अंधकासुर का रक्त पृथ्वी पर गिर रहा था। उस नवजात प्राणी ने उस रक्त को पी लिया। इतना ही नहीं, युद्ध में पृथ्वी पर जो कुछ गिरा था, उसने उसे भी ग्रहण कर लिया।
लेकिन इसके बावजूद उसकी भूख शांत नहीं हुई।
मत्स्य पुराण के अनुसार वह प्राणी लगातार भूख से व्याकुल रहा। उसकी यह भूख इतनी प्रबल थी कि वह तीनों लोकों को ही अपना आहार बनाने की इच्छा करने लगा।
यहीं से कथा में एक नया मोड़ आता है।
तीनों लोकों को निगलने की शक्ति के लिए की तपस्या
अपनी भूख शांत करने और अपनी इच्छा पूरी करने के लिए उस प्राणी ने भगवान शिव के सामने कठोर तपस्या शुरू कर दी।
लंबे समय तक उसकी तपस्या के बाद भगवान शिव उससे प्रसन्न हुए और उसे वरदान मांगने के लिए कहा।
तब उस प्राणी ने ऐसी शक्ति मांगी जिससे वह तीनों लोकों को निगलने में सक्षम हो सके।
भगवान शिव ने उसकी इच्छा स्वीकार कर उसे यह वर प्रदान कर दिया।
वरदान प्राप्त होते ही उस प्राणी की शक्ति और भी बढ़ गई।
जब उसका विशाल शरीर तीनों लोकों पर छाने लगा
वरदान मिलने के बाद वह प्राणी इतना विशाल हो गया कि उसने अपने शरीर से स्वर्ग, पृथ्वी और आकाश को घेरना शुरू कर दिया।
मत्स्य पुराण के वर्णन में वह पूरे त्रिलोक को अपने शरीर से रोकता हुआ पृथ्वी की ओर गिरता है। उसकी शक्ति देखकर देवता भयभीत हो गए।
अब समस्या केवल देवताओं के लिए नहीं थी। यदि वह अपनी इच्छा के अनुसार तीनों लोकों को निगल लेता, तो पूरी सृष्टि संकट में पड़ सकती थी।
इसलिए देवताओं को उसे रोकने के लिए एक साथ आना पड़ा।
देवताओं ने उसे भूमि पर दबा दिया
वास्तु पुरुष की बढ़ती शक्ति को देखकर ब्रह्मा, शिव तथा अन्य देवताओं के साथ दानव और राक्षस भी उसे चारों ओर से पकड़ने लगे।
जिस दिशा और स्थान पर उसके शरीर का जो भाग आया, उसे वहीं रोक दिया गया। इस प्रकार उस विशाल प्राणी को भूमि पर स्थिर कर दिया गया।
कथा में आगे वास्तु पुरुष स्वयं पूछता है कि जब उसे इस तरह रोका गया है, तो वह किस रूप में रहेगा।
उसे अधोमुख, अर्थात् नीचे की ओर मुख करके स्थित बताया गया है।
यहीं से वास्तु पुरुष की वह कल्पना सामने आती है जिसे बाद की वास्तु परंपरा में भूमि पर फैले हुए एक विशाल पुरुष के रूप में देखा गया।
फिर उसका नाम “वास्तु” कैसे पड़ा?
यह इस पूरी कथा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब देवताओं ने उस प्राणी को भूमि पर स्थिर कर दिया, तब उसके शरीर पर देवताओं का निवास हुआ। इसी कारण उसे “वास्तु” कहा गया।
मत्स्य पुराण में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है:
“निवासात् सर्वदेवानां वास्तुरित्यभिधीयते।”
अर्थात्, सभी देवताओं के निवास के कारण उसका नाम वास्तु पड़ा।
इसलिए “वास्तु पुरुष” नाम को केवल किसी आधुनिक वास्तु-दोष या भवन निर्माण की धारणा से जोड़कर देखना अधूरा होगा। इसकी जड़ एक पुराणिक कथा में है, जहां एक विशाल दिव्य प्राणी भूमि और देवताओं के निवास से जुड़ जाता है।
वास्तु पुरुष को देवताओं से क्या मिला?
भूमि पर दबाए जाने के बाद वास्तु पुरुष ने देवताओं से अपनी स्थिति और भविष्य के बारे में पूछा।
तब ब्रह्मा आदि देवताओं ने उसे आश्वासन दिया कि वास्तु के मध्य होने वाली बलि और पूजा उसके लिए आहार का माध्यम होगी। यज्ञ, उत्सव और अन्य धार्मिक अवसरों पर भी उसके लिए बलि की व्यवस्था बताई गई।
इससे कथा में एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है वास्तु पुरुष को केवल दबाकर छोड़ नहीं दिया गया था। देवताओं ने उसके लिए एक निश्चित स्थान और पूजा से जुड़ी व्यवस्था भी निर्धारित की।
अंत में वह इस व्यवस्था से प्रसन्न हुआ और तभी वह “वास्तु” कहलाया। मत्स्य पुराण इसी प्रसंग के बाद वास्तुयज्ञ को शांति से जोड़ता है।
वास्तु पुरुष और वास्तु पूजा का संबंध
यहीं से वास्तु पुरुष और वास्तु पूजा के बीच संबंध समझ में आता है।
मत्स्य पुराण की कथा के अनुसार वास्तु पुरुष भूमि पर स्थित हैं और देवताओं का निवास उनके शरीर पर माना गया है। इसलिए किसी भवन या अन्य निर्माण से संबंधित कार्य में भूमि को केवल मिट्टी का एक टुकड़ा नहीं माना जाता, बल्कि उसे एक ऐसी पवित्र व्यवस्था के रूप में देखा जाता है जिसमें देवताओं और वास्तु पुरुष का स्थान है।
इसी धार्मिक दृष्टिकोण से वास्तु पूजा और वास्तुयज्ञ की परंपरा को समझा जा सकता है। मत्स्य पुराण के इसी अध्याय में वास्तुयज्ञ को शांति के लिए स्मरण किया गया है।
क्या वास्तु पुरुष केवल एक “भयावह शक्ति” हैं?
वास्तु पुरुष की कथा की शुरुआत निश्चित रूप से एक भयंकर प्राणी से होती है। वह अत्यधिक भूखा है, तीनों लोकों को निगलने की इच्छा रखता है और इतना शक्तिशाली हो जाता है कि देवताओं को मिलकर उसे रोकना पड़ता है।
लेकिन कथा का अंत केवल भय पर नहीं होता।
देवता उसे भूमि पर स्थिर करते हैं, उसके शरीर पर निवास करते हैं और उसके साथ एक व्यवस्था स्थापित करते हैं। इस तरह एक अनियंत्रित और विशाल शक्ति को व्यवस्थित शक्ति में बदल दिया जाता है।
इसी दृष्टि से वास्तु पुरुष की कथा को केवल “घर में दोष पैदा करने वाली शक्ति” के रूप में देखना इस पुराणिक कथा को बहुत छोटा कर देता है।
वास्तु पुरुष की आकृति का प्रतीकात्मक अर्थ
वास्तु परंपरा में वास्तु पुरुष को सामान्यतः भूमि पर अधोमुख लेटे हुए पुरुष के रूप में दिखाया जाता है।
इस कल्पना का मूल आधार यही पुराणिक कथा है एक विशाल पुरुष का शरीर पूरी भूमि को घेरता है और देवता उसके शरीर के विभिन्न स्थानों से जुड़े हैं।
बाद की वास्तु परंपराओं में इसी विचार का विकास वास्तु पुरुष मंडल जैसी योजनाओं में दिखाई देता है। इसमें भूमि को विभिन्न भागों में विभाजित करके अलग-अलग देवताओं के स्थान निर्धारित किए जाते हैं।
इस प्रकार वास्तु पुरुष केवल एक पौराणिक पात्र नहीं रह जाते, बल्कि वे भूमि, दिशा, देवता और भवन निर्माण के बीच संबंध का प्रतीक बन जाते हैं।
क्या वास्तु पुरुष की उत्पत्ति की यही एकमात्र कथा है?
यहां थोड़ी सावधानी जरूरी है।
भारतीय वास्तु परंपरा में वास्तु पुरुष की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में भिन्न कथाएं मिलती हैं। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि हर शास्त्र में वास्तु पुरुष की उत्पत्ति बिल्कुल इसी तरह बताई गई है।
लेकिन मत्स्य पुराण में वर्णित कथा स्पष्ट रूप से बताती है कि शिव के ललाट से गिरे स्वेद से वह भयंकर प्राणी उत्पन्न हुआ, बाद में उसने शिव से वर प्राप्त किया, तीनों लोकों को घेर लिया और देवताओं द्वारा भूमि पर स्थिर किए जाने के बाद “वास्तु” कहलाया।
इसलिए किसी लेख में इस कथा को प्रस्तुत करते समय यह कहना अधिक सही है कि “मत्स्य पुराण के अनुसार…”, न कि इसे सभी भारतीय ग्रंथों की एकमात्र मान्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
इस कथा का सबसे गहरा संदेश क्या है?
वास्तु पुरुष की कथा को केवल एक पौराणिक घटना के रूप में पढ़ने के बजाय इसके प्रतीकात्मक पक्ष को भी समझा जा सकता है।
कथा की शुरुआत एक ऐसी शक्ति से होती है जो असीम, भूखी और अनियंत्रित है। वह बढ़ती जाती है और अंततः पूरी सृष्टि को अपने भीतर समेट लेने की क्षमता प्राप्त कर लेती है।
देवता उस शक्ति को नष्ट नहीं करते। वे उसे स्थिर और व्यवस्थित करते हैं।
यही विचार वास्तु की व्यापक अवधारणा से जुड़ता हुआ दिखाई देता है—भूमि को व्यवस्थित करना, दिशाओं और स्थानों को निर्धारित करना तथा निर्माण को एक निश्चित व्यवस्था के अनुसार करना।
इस दृष्टि से वास्तु पुरुष की कथा को अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर जाने वाली एक प्रतीकात्मक कथा के रूप में भी समझा जा सकता है।
निष्कर्ष
वास्तु पुरुष की उत्पत्ति की कथा जितनी रोचक है, उतनी ही गहरी भी।
मत्स्य पुराण के अनुसार, अंधकासुर के साथ भगवान शिव के भयंकर युद्ध के दौरान उनके ललाट से गिरे स्वेद से एक विशाल और भयंकर प्राणी उत्पन्न हुआ। उसकी भूख शांत नहीं हुई और उसने तीनों लोकों को निगलने की शक्ति पाने के लिए शिव की तपस्या की। शिव ने उसे वरदान दिया, जिसके बाद वह अपने शरीर से तीनों लोकों को घेरने लगा।
उसकी इस शक्ति से भयभीत होकर देवताओं ने उसे चारों ओर से पकड़कर भूमि पर अधोमुख स्थिति में स्थिर कर दिया। उसके शरीर पर देवताओं के निवास के कारण उसे “वास्तु” कहा गया। बाद में वास्तु पूजा और वास्तुयज्ञ से संबंधित व्यवस्था भी इसी कथा से जुड़ती है।
इसलिए वास्तु पुरुष को केवल घर के नक्शे में बने एक प्रतीक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। उनकी कथा भारतीय परंपरा में भूमि, देवत्व, व्यवस्था और निर्माण के बीच संबंध को समझने का एक पौराणिक माध्यम है।
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